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बिहार बीजेपी में बदल गया जातीय समीकरण, टिकट बंटवारे में यादव नेता साइडलाइन; मुस्लिम शून्य 

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पटना 

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले भारतीय जनता पार्टी में जातीय समीकरण को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। पार्टी ने अपने कोटे की सभी 101 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है, लेकिन इस लिस्ट ने अंदरूनी बवाल खड़ा कर दिया है। वजह — यादव नेताओं को टिकट बंटवारे में साइडलाइन किया जाना।
एनडीए में इस बार बीजेपी को 101, जेडीयू को 101, लोजपा(रामविलास) को 29, जबकि जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टियों को 6-6 सीटें मिली हैं।
बीजेपी ने अपने 17 मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए हैं, जिनमें यादव समुदाय से आने वाले कई वरिष्ठ चेहरे शामिल हैं। औराई विधायक रामसूरत यादव ने खुले तौर पर पार्टी पर “जातिवादी भेदभाव” का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि टिकट सिर्फ इसलिए काटा गया क्योंकि वे यादव बिरादरी से हैं।


रामसूरत यादव ने उन सभी यादव नेताओं की सूची भी गिनाई, जिनके टिकट इस बार कटे हैं — प्रणव यादव, पवन यादव, नंदकिशोर यादव, मिश्रीलाल यादव, जयप्रकाश यादव और प्रहलाद यादव। उन्होंने कहा, “पहले मुसलमानों को किनारे किया गया, अब यादवों को भी साइडलाइन किया जा रहा है। बीजेपी अब बिना यादवों के चुनाव जीतने का दावा कर रही है।”
मिश्रीलाल यादव ने तो सीधे पार्टी छोड़ने का एलान कर दिया। अलीनगर सीट से उनका टिकट काटकर भोजपुरी गायिका मैथिली ठाकुर को प्रत्याशी बनाया गया है। मिश्रीलाल ने कहा, “भाजपा घमंड में है। पिछड़ों और दलितों के साथ-साथ मेरा भी अपमान हुआ है।” गौरतलब है कि भाजपा ने इस बार केवल छह यादव उम्मीदवारों को टिकट दिया है। जबकि साल 2020 में यह संख्या 15 थी और 2015 में पार्टी ने 22 यादवों को मौका दिया था।
इस बार टिकट कटने वालों में सबसे चौंकाने वाला नाम सात बार के विधायक नंदकिशोर यादव का रहा, जो 1995 से लगातार पटना पूर्वी सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे थे।


इसी तरह मुंगेर से प्रणव यादव का टिकट काटकर पार्टी ने “नए चेहरे” को मौका दिया है। वहीं कहलगांव से पवन यादव की सीट अब जेडीयू को दे दी गई है, जो 2020 में उन्होंने कांग्रेस के शुभानंद मुकेश को हराकर जीती थी।
प्रहलाद यादव के लिए भी इस बार झटका बड़ा रहा। उनकी सूर्यगढ़ा सीट जेडीयू को दे दी गई है। आरजेडी छोड़कर एनडीए में आए प्रहलाद को टिकट नहीं मिला, जबकि माना जा रहा है कि जेडीयू अध्यक्ष ललन सिंह ने इस पर आपत्ति जताई थी।
बीजेपी की इस लिस्ट से साफ है कि पार्टी बिहार में अब यादव समीकरण को पीछे छोड़, नए सामाजिक फार्मूले पर दांव खेलना चाहती है — लेकिन इससे अंदरूनी असंतोष भी तेजी से उभर आया है।

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